प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।
{राज्ञः सुखं प्रजासुखे, प्रजानां च हिते (तस्य) हितम्, आत्मप्रियं राज्ञः हितं न, (अपि) तु प्रजानां प्रियं हितम् ।}
प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; अर्थात् जब प्रजा सुखी अनुभव करे तभी राजा को संतोष करना चाहिए । प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है । वैयक्तिक स्तर पर राजा को जो अच्छा लगे उसमें उसे अपना हित न देखना चाहिए, बल्कि प्रजा को जो ठीक लगे, यानी जिसके हितकर होने का प्रजा अनुमोदन करे, उसे ही राजा अपना हित समझे ।
इसलिए हम भ्रष्टाचार से लड़ रहे सभी संतो और व्यक्तियों को प्रजा का राजा मानते हुए रामदेव जी के अनशन तोड़ने के निर्णय की सराहना करते हैं !
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।
{राज्ञः सुखं प्रजासुखे, प्रजानां च हिते (तस्य) हितम्, आत्मप्रियं राज्ञः हितं न, (अपि) तु प्रजानां प्रियं हितम् ।}
प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; अर्थात् जब प्रजा सुखी अनुभव करे तभी राजा को संतोष करना चाहिए । प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है । वैयक्तिक स्तर पर राजा को जो अच्छा लगे उसमें उसे अपना हित न देखना चाहिए, बल्कि प्रजा को जो ठीक लगे, यानी जिसके हितकर होने का प्रजा अनुमोदन करे, उसे ही राजा अपना हित समझे ।
इसलिए हम भ्रष्टाचार से लड़ रहे सभी संतो और व्यक्तियों को प्रजा का राजा मानते हुए रामदेव जी के अनशन तोड़ने के निर्णय की सराहना करते हैं !

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